राजनीतिक इस्लाम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजनीतिक इस्लाम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 5 जनवरी 2026

राजनीतिक इस्लाम


  


 अध्याय 11

इस्लाम की मूल धार्मिक अवधारणाएँ और शब्दावली**

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में इस्लाम की कुछ मूल धार्मिक अवधारणाओं, आस्थाओं और प्रचलित शब्दों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया गया है, जिनका प्रयोग आगे की चर्चा में संदर्भ के रूप में होता है।

मुख्य व्याख्या

इस्लाम की बुनियादी आस्था का केंद्रीय कथन है— “अशहद ला इलाहा इल्लल्लाह, मोहम्मद रसूल्लाह”, अर्थात अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है और मोहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।
सामान्य धारणा के अनुसार, सच्चा मुस्लिम शांतिप्रिय होता है; इस संदर्भ में “शांतिप्रिय” का अर्थ इस्लाम के प्रति निष्ठावान होना बताया जाता है।
कुरान में यह कहा गया है कि अल्लाह ने जिन्न, मखलूक़ात और मनुष्य को अपनी इबादत के उद्देश्य से उत्पन्न किया।

उदाहरण/संदर्भ

यहाँ “धिम्मी” या “डिम्मी” शब्द का उल्लेख किया गया है, जिसका आशय ऐसे गैर-मुस्लिम से है जो भय या प्रलोभनवश इस्लाम के विस्तार में सहायक बनता है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय इस्लाम से संबंधित मूल धार्मिक कथनों और शब्दों की पृष्ठभूमि स्पष्ट करता है, जो आगे की वैचारिक और ऐतिहासिक चर्चा के लिए आधार बनते हैं।


**अध्याय 12

ऐतिहासिक संदर्भ: धार्मिक विचारधाराएँ और सत्ता-संरचनाएँ**

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में कुछ ऐतिहासिक घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है, जिनका संबंध धार्मिक विचारधाराओं और राजनीतिक सत्ता से जोड़ा जाता है।

मुख्य व्याख्या

यह उल्लेख किया गया है कि बलूला दहलवी के आमंत्रण पर अहमद शाह अब्दाली भारत आए और मराठाओं के साथ पानीपत के तीसरे युद्ध में संघर्ष हुआ, जिसमें मराठाओं की पराजय हुई।
इसी वैचारिक परंपरा से जोड़ते हुए यह कहा गया है कि आज अफगानिस्तान में सत्ता में मौजूद तालिबान भी बलूला दहलवी की विचारधारा से प्रभावित माने जाते हैं। “तालिब” शब्द का अर्थ विद्यार्थी बताया गया है।

उदाहरण/संदर्भ

अब्दुल वहाब का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि उन्होंने सऊदी कबीले के साथ मिलकर सऊदी अरब राज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय यह दर्शाता है कि किस प्रकार कुछ धार्मिक विचारधाराएँ ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक सत्ता और संघर्षों से जुड़ी रही हैं।


**अध्याय 13

भारतीय समाज और इस्लाम संबंधी अनविज्ञता**

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में भारतीय समाज, विशेषतः हिंदू समाज, में इस्लाम को लेकर प्रचलित अनविज्ञता पर चर्चा की गई है।

मुख्य व्याख्या

यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि सभ्य समाजों में इस्लाम के विषय में सबसे अधिक अनभिज्ञता भारत के हिंदुओं में देखी जाती है। अल-बिरूनी का कथन उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय विद्वानों का यह विश्वास कि उनके पास उपलब्ध ज्ञान ही सर्वोत्तम है, अंततः सांस्कृतिक पतन का कारण बन सकता है।

उदाहरण/संदर्भ

समकालीन संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दिए गए एक भाषण का उल्लेख है, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश और फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के साथ-साथ “राजनीतिक इस्लाम” के विरुद्ध ऐतिहासिक संघर्षों का उल्लेख किया। इस क्रम में राणा प्रताप, महाराणा सांगा, छत्रपति शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह जैसे व्यक्तित्वों के नाम लिए गए।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय इस निष्कर्ष तक पहुँचता है कि इस्लाम और उसके विभिन्न रूपों को समझने की कमी समाज में व्यापक है, और इसी कारण वैचारिक भ्रम उत्पन्न होता है।


**अध्याय 14

राजनीतिक इस्लाम की अवधारणा: भूमिका**

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में “राजनीतिक इस्लाम” शब्द की पृष्ठभूमि और उसके प्रयोग की आवश्यकता पर प्रारंभिक चर्चा की गई है।

मुख्य व्याख्या

यह बताया गया है कि “पॉलिटिकल इस्लाम” शब्द का प्रयोग शंकर शरण द्वारा एक सार्वजनिक कार्यक्रम में किया गया था, जहाँ उन्होंने इस विषय पर चर्चा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने इस संदर्भ में डॉ. बिल वार्नर की पुस्तकों का उल्लेख किया।
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि राजनीतिक इस्लाम की अवधारणा है, तो एक गैर-राजनीतिक इस्लाम भी अस्तित्व में होना चाहिए। इसी बिंदु से यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस्लाम के कौन-से तत्व राजनीतिक हैं और कौन-से गैर-राजनीतिक।

उदाहरण/संदर्भ

व्हाट्सऐप समूहों में प्राप्त प्रश्नों का उल्लेख किया गया है, जहाँ लोगों ने पूछा कि राजनीतिक इस्लाम क्या है, इसकी जानकारी कहाँ से मिलेगी, और इसका इस्लाम से क्या संबंध है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय राजनीतिक इस्लाम पर प्रस्तावित अध्ययन की भूमिका के रूप में कार्य करता है और यह स्पष्ट करता है कि विषय को समझने से पहले इस्लाम की मूल परिभाषा को जानना आवश्यक है।


**अध्याय 15

इस्लाम की परिभाषा और समकालीन अनविज्ञता**

पृष्ठभूमि

यह अध्याय इस प्रश्न पर केंद्रित है कि इस्लाम की वास्तविक परिभाषा क्या है और समाज में इसके प्रति कितनी जानकारी उपलब्ध है।

मुख्य व्याख्या

यह तर्क दिया गया है कि भारत में सामान्य सर्वेक्षण करने पर 90–95 प्रतिशत लोग इस्लाम की स्पष्ट परिभाषा तक नहीं जानते। यहाँ तक कि इस्लाम का पालन करने वाले अनेक मुसलमानों की जानकारी भी सीमित बताई गई है, जो कुछ वाक्यों से आगे नहीं बढ़ पाती।

उदाहरण/संदर्भ

1925 के आसपास एम.एन. रॉय—भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक—द्वारा दिए गए एक कथन का उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने वैश्विक स्तर पर इस्लाम संबंधी समझ की स्थिति पर टिप्पणी की थी।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इस्लाम को लेकर व्यापक स्तर पर जानकारी की कमी है, और इसी कमी के कारण राजनीतिक इस्लाम जैसे विषयों पर सार्थक संवाद कठिन हो जाता है।


  

अध्याय 16

भारत में इस्लाम की दीर्घ उपस्थिति और सामाजिक अनविज्ञता**

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में भारत में इस्लाम की जनसंख्या, ऐतिहासिक सत्ता-काल और इसके बावजूद समाज में बनी अनविज्ञता के प्रश्न को प्रस्तुत किया गया है।

मुख्य व्याख्या

यह कहा गया है कि भारत में मुसलमानों की संख्या अत्यधिक है और यह भी कि लगभग एक हजार वर्षों तक इस्लामी सत्ता का प्रभाव विभिन्न रूपों में रहा। इसके बावजूद यह तथ्य रेखांकित किया गया कि भारतीय हिंदू समाज में इस्लाम के विषय में पर्याप्त जानकारी का अभाव बना रहा।
एम.एन. रॉय के कथन के अनुसार, संसार के सभ्य समाजों में इस्लाम के प्रति सबसे अधिक अनविज्ञता भारतीय हिंदुओं में पाई जाती है। उनके अनुसार, इतने लंबे ऐतिहासिक संपर्क के बावजूद भी इस्लाम को लेकर समझ का स्तर अत्यंत सीमित है, जो किसी अन्य सभ्य समाज में इस रूप में दिखाई नहीं देता।

उदाहरण/संदर्भ

एम.एन. रॉय ने अपने तर्क में यह जोड़ा कि भारत में इस्लाम की निरंतर उपस्थिति के बावजूद यह अनविज्ञता बनी रहना एक विशिष्ट सामाजिक परिघटना है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ऐतिहासिक निकटता और दीर्घ सह-अस्तित्व के बावजूद इस्लाम के प्रति सामाजिक समझ का अभाव एक गंभीर प्रश्न है।


**अध्याय 17

अल-बिरूनी का विश्लेषण और ज्ञान-संबंधी मानसिकता**

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में लगभग एक हजार वर्ष पूर्व अल-बिरूनी द्वारा दिए गए विश्लेषण को वर्तमान संदर्भ से जोड़ा गया है।

मुख्य व्याख्या

अल-बिरूनी के अनुसार, जब वे भारत आए और यहाँ के विद्वानों से उनका संपर्क हुआ, तो उन्होंने यह अनुभव किया कि भारतीय विद्वानों ने यह मान लिया था कि उनके पास उपलब्ध ज्ञान ही सर्वोत्तम है और इसके अतिरिक्त किसी अन्य ज्ञान को जानने की आवश्यकता नहीं है।
अल-बिरूनी ने इस मानसिकता को सांस्कृतिक पतन का संभावित कारण बताया। एम.एन. रॉय के तर्क में यही बिंदु दोहराया गया कि इस्लाम के प्रति अनविज्ञता का कारण यह आत्मसंतुष्ट ज्ञान-दृष्टि है।

उदाहरण/संदर्भ

यह कथन उद्धृत किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि ज्ञान महँगा है, तो उसे अज्ञान के परिणामों को अनुभव करके देखना चाहिए—यह कथन अज्ञान की कीमत को रेखांकित करता है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय इस निष्कर्ष को पुष्ट करता है कि ज्ञान के प्रति बंद दृष्टिकोण दीर्घकाल में सामाजिक और सांस्कृतिक क्षति का कारण बन सकता है।


**अध्याय 18

बलीउल्लाह दहलवी और ऐतिहासिक-वैचारिक निरंतरता**

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में अठारहवीं शताब्दी के आसपास व्यक्त की गई उन चेतावनियों और विचारों का विवरण है, जो इस्लाम, सत्ता और समाज के संबंधों से जुड़े हैं।

मुख्य व्याख्या

1750 के आसपास बलीउल्लाह दहलवी द्वारा इस्लाम के प्रति अनविज्ञता के परिणामों पर विचार व्यक्त किए गए। बलीउल्लाह दहलवी के पारिवारिक संदर्भ में यह बताया गया कि उनके पिता और दादा औरंगज़ेब की संवैधानिक परिषद के सदस्य थे, जो फतवा-ए-आलमगीरी नामक इस्लामिक विधि-संहिता के निर्माण के लिए गठित की गई थी।
औरंगज़ेब द्वारा गठित इस परिषद में लगभग पाँच सौ इस्लामिक विद्वान शामिल थे, जो सऊदी अरब, ईरान, इराक और भारत से आए थे। इस प्रयास का उद्देश्य शासन के लिए एक इस्लामिक क़ानूनी ढाँचा तैयार करना था।

उदाहरण/संदर्भ

औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात बलीउल्लाह दहलवी द्वारा अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली को पत्र लिखने का उल्लेख है, जिसमें भारत में पुनः इस्लामी सत्ता स्थापित करने का आग्रह किया गया। इसके परिणामस्वरूप अहमद शाह अब्दाली दस हज़ार सैनिकों के साथ भारत आए और पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठाओं से संघर्ष हुआ, जिसमें मराठाओं की पराजय हुई।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय बलीउल्लाह दहलवी की ऐतिहासिक और वैचारिक हैसियत को रेखांकित करता है तथा यह दर्शाता है कि उनके विचारों का राजनीतिक घटनाओं पर प्रभाव पड़ा।


**अध्याय 19

वहाबी और दहलवी विचारधाराएँ: वैश्विक प्रभाव**

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में बलीउल्लाह दहलवी और अब्दुल वहाब की विचारधाराओं के वैश्विक प्रभाव की चर्चा की गई है।

मुख्य व्याख्या

यह बताया गया है कि बलीउल्लाह दहलवी और अब्दुल वहाब समकालीन विद्वान थे और दोनों इब्न-तैमिया की विचारधारा से प्रभावित थे। अब्दुल वहाब ने सऊदी कबीले के साथ मिलकर सऊदी अरब राज्य की स्थापना में भूमिका निभाई।
इसी वैचारिक परंपरा से देवबंद आंदोलन के संस्थापकों को जोड़ा गया है। आगे चलकर इसी विचारधारा से प्रशिक्षित मौलाना मौदूदी द्वारा जमात-ए-इस्लामी की स्थापना का उल्लेख किया गया है।

उदाहरण/संदर्भ

तालिबान को भी बलीउल्लाह दहलवी की विचारधारा से प्रभावित बताया गया है, जहाँ “तालिब” शब्द का अर्थ विद्यार्थी बताया गया है। इसके अतिरिक्त, 1924 के आसपास मोहम्मद इलियास द्वारा तबलीगी जमात की स्थापना का उल्लेख है, जिसे इसी वैचारिक परंपरा से जोड़ा गया है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय इस निष्कर्ष तक पहुँचता है कि बलीउल्लाह दहलवी और अब्दुल वहाब की विचारधाराओं का प्रभाव व्यापक रहा है और आधुनिक इस्लामी आंदोलनों के एक बड़े हिस्से को इन्हीं से जोड़ा जाता है।


**अध्याय 20

राजनीतिक इस्लाम की समझ की आवश्यकता**

पृष्ठभूमि

यह अध्याय राजनीतिक इस्लाम को समझने की आवश्यकता और उससे जुड़े प्रश्नों की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है।

मुख्य व्याख्या

यह कहा गया है कि राजनीतिक इस्लाम पर पर्याप्त साहित्य उपलब्ध नहीं है, किंतु उससे पहले यह समझना आवश्यक है कि इस्लाम को समझने के लिए कौन-सी मूल पुस्तकों और स्रोतों का अध्ययन किया गया है।
यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि जब तक इस्लाम की बुनियादी समझ विकसित नहीं होती, तब तक राजनीतिक इस्लाम जैसे विषयों पर सार्थक चर्चा संभव नहीं है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय इस निष्कर्ष के साथ समाप्त होता है कि राजनीतिक इस्लाम पर चर्चा से पूर्व इस्लाम की मूल अवधारणाओं और इतिहास की समझ अनिवार्य है।


 

अध्याय 21

इस्लाम के विषय में जानकारी का अभाव और उसके कारण

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में इस्लाम के प्रति व्यापक जानकारी की कमी, शिक्षा के स्रोतों की अनुपस्थिति तथा इस्लामी शिक्षण संस्थानों की सीमाओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। साथ ही कुरान में काफिरों के लिए वर्णित विशेषताएँ और उनकी सामाजिक व धार्मिक अभिव्यक्ति पर चर्चा की गई है।

मुख्य व्याख्या

भारत तथा समस्त उपमहाद्वीप में इस्लाम के विषय में गहन और व्यवस्थित ज्ञान प्राप्ति के लिए कोई प्रभावशाली और समावेशी शैक्षिक संस्थान उपलब्ध नहीं हैं। शैक्षिक संस्थानों में इस्लाम की पढ़ाई न के बराबर होती है और मदरसों में गैर मुस्लिमों का प्रवेश प्रतिबंधित है। देवबंद जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक केंद्रों के लगभग सवा सौ वर्षों के इतिहास में कोई भी गैर मुस्लिम इस्लाम की गहन शिक्षा प्राप्त कर नहीं निकला, जिससे इस विषय में व्यापक अनजागरूकता बनी रहती है।

कुरान की आयतों के आधार पर बताया गया है कि काफिर, अर्थात् जो अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों को स्वीकार नहीं करते, वे मूर्ख, अंधे, बहरे और गूंगे होते हैं। अध्याय 2, सूरह बकरा की आयत 13 और 18 में इस तथ्य का वर्णन है कि जब उनसे ईमान लाने के लिए कहा जाता है, तो वे मूर्खता समझ कर इंकार करते हैं। इस प्रकार, धार्मिक दृष्टिकोण से काफिरों की स्थिति ऐसी बताई गई है कि वे इस्लाम का ज्ञान ग्रहण करने में असमर्थ या अनिच्छुक हैं।

इस्लाम में प्रतिदिन पांच बार अजान के समय शहादा (कलमा) का उच्चारण होता है — “अशहदु अल्लाहा इल्लल्लाह मोहम्मदुर रसूलुल्लाह”, जिसका अर्थ है कि “अल्लाह के सिवा कोई दूसरा भगवान नहीं है और मोहम्मद उसके रसूल हैं।” इस कलमे का अर्थ एवं इसकी ध्वनि प्रभावशाली है, परन्तु गैर मुसलमानों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि कुरान के अनुसार वे बहरे हैं और न ही यह ज्ञान उनके लिए समझ में आता है।

गांधी जी के तीन बंदरों के सिद्धांत के समान, गैर मुसलमानों को इस्लाम के प्रति “देखना, सुनना और कहना” अवगुण के रूप में दर्शाया गया है। वे न तो इस्लाम को समझते हैं, न सुनते हैं और न ही इस पर कुछ कहने योग्य होते हैं, क्योंकि वे काफिर हैं।

उदाहरण / संदर्भ

अल-बिरूनी द्वारा भारत के विद्वानों के ज्ञान-संतोषी रवैए का उल्लेख किया गया है, जिन्होंने माना कि उनके पास उपलब्ध ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है, जिससे उनकी ज्ञानार्जन की इच्छा समाप्त हो गई। यह रवैया सामाजिक एवं सांस्कृतिक पतन का कारण बनेगा।

संक्षिप्त निष्कर्ष

इस अध्याय में यह स्पष्ट किया गया कि इस्लाम के प्रति व्यापक अनभिज्ञता का मूल कारण शिक्षा के अभाव, धार्मिक भेदभाव और सामाजिक दृष्टिकोण में विद्यमान असहिष्णुता है। इसके अतिरिक्त, धार्मिक ग्रंथों द्वारा काफिरों को ज्ञान-विहीन और असंवेदनशील दर्शाने से भी यह स्थिति जटिल हो जाती है।


अध्याय 22

इस्लाम की समझ आवश्यक क्यों है: सामाजिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में इस्लाम के प्रति गैर मुस्लिमों, विशेषकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के संदर्भ में, जानकारी क्यों आवश्यक है, इस विषय का विवेचन किया गया है।

मुख्य व्याख्या

भारत सहित दक्षिण एशिया के क्षेत्र में लगभग 24 प्रतिशत जनसंख्या इस्लाम पर विश्वास करती है। ऐसे में यदि हम “वसुधैव कुटुम्बकम” के सिद्धांत को अपनाएं, जिसका अर्थ है ‘संपूर्ण विश्व एक परिवार है’, तो यह आवश्यक हो जाता है कि एक समुदाय अपने पड़ोसी और सह-अस्तित्व वाले समुदाय के धार्मिक विश्वासों, संस्कारों और मूल सिद्धांतों को समझे।

भाइचारे और सामंजस्य के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि आपका ‘भाई’ क्या मानता है, उसकी मान्यताएँ और विश्वास किस आधार पर हैं। बिना इस समझ के सह-अस्तित्व में भ्रम, अविश्वास और असहिष्णुता की संभावना बढ़ जाती है।

गैर मुस्लिमों के लिए यह जानना जरूरी है कि मस्जिदों में क्या होता है, मदरसों में क्या पढ़ाया जाता है, और इस्लाम के धार्मिक अनुयायियों का सामाजिक व्यवहार कैसा होता है। यह समझ आपसी सम्मान और सामुदायिक एकता की नींव बनाती है।

उदाहरण / संदर्भ

यदि हम अपने घर की बात करें, तो परिवार के सदस्यों के कार्यकलाप, विचार और विश्वासों को जानना सामान्य व्यवहार है। ठीक उसी प्रकार, सामाजिक परिप्रेक्ष्य में पड़ोसी या भाई समुदाय के धार्मिक विश्वासों का ज्ञान आवश्यक है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह अध्याय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि सामाजिक सौहार्द्र और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व के लिए हर समुदाय को दूसरे समुदाय के धार्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को समझना आवश्यक है। अनभिज्ञता के कारण उत्पन्न गलतफहमियां सामाजिक विखंडन को बढ़ावा देती हैं, जिसे रोकने के लिए ज्ञान अर्जन अनिवार्य है।


 

अध्याय 23

इस्लाम की समझ से सामाजिक सद्भाव की स्थापना और अशिक्षा के विभिन्न आयाम

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में इस्लाम के विषय में सही जानकारी की आवश्यकता और इससे उत्पन्न होने वाले सामाजिक लाभों की चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त, आधुनिक युग में अशिक्षा के विभिन्न स्वरूपों को समझने का प्रयास किया गया है, तथा इस्लाम की परिभाषा और उससे जुड़ी मूलभूत अवधारणाओं का विवेचन प्रस्तुत है।

मुख्य व्याख्या

इस्लाम के विषय में उचित जानकारी होने से विभिन्न समुदायों के बीच उत्पन्न होने वाले भ्रम और तनाव को दूर किया जा सकता है। जब किसी व्यक्ति को इस्लाम की संवेदनशील भावनाओं और सीमाओं का ज्ञान होता है, तो वह अनजाने में या अज्ञानवश किसी प्रकार की अपमानजनक टिप्पणी या व्यवहार करने से बचता है। यह ज्ञान सामाजिक सद्भाव और सामंजस्य के लिए आवश्यक है।

अल्लाह का संदेश है कि “देर इज नो गॉड बट अल्लाह” अर्थात् अल्लाह के सिवा कोई अन्य ईश्वर नहीं। यह विचार केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए है। अतः, गैर मुस्लिमों को भी इस संदेश की समझ होनी चाहिए ताकि वे इस्लाम को समझ सकें, सम्मान कर सकें या फिर अपनी राय बना सकें। इससे मुसलमानों के साथ सामाजिक संबंध भी बेहतर होंगे।

आधुनिक युग में अशिक्षा के कई प्रकार देखे जा सकते हैं। पहला, वह अशिक्षा जिसमें कोई व्यक्ति लिखना-पढ़ना नहीं जानता। दूसरा, वह अशिक्षा जिसमें व्यक्ति कंप्यूटर या तकनीकी ज्ञान से वंचित होता है, जिसे कंप्यूटर इलिटरेसी की कमी कहा जाता है। तीसरा, एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से अनजान होना भी एक प्रकार की अशिक्षा माना जा रहा है। चौथा, इस्लामिक अशिक्षा है, जिसमें व्यक्ति इस्लाम के विषय में अज्ञान है।

कुरान की अध्याय 2, आयत 78 के अनुसार, जो गैर मुस्लिम इस्लाम के विषय में अनजान हैं, वे जाहिल (अज्ञानी) माने जाते हैं। यह स्पष्ट करता है कि संसार इस्लाम के दृष्टिकोण से दो वर्गों में बटा हुआ है—एक शिक्षित जो इस्लाम को समझते हैं, और दूसरा अशिक्षित जो इस्लाम से अनजान हैं।

गैर मुस्लिमों में से ऐसे कई लोग होते हैं जिन्हें ‘धिम्मी’ कहा गया है, अर्थात् वे जो भले ही मुसलमान न हों, लेकिन डर या स्वार्थवश इस्लाम के विस्तार में अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करते हैं। धिम्मी वर्ग के लोग एक दिन अवश्य मुसलमान बनेंगे, ऐसा माना गया है।

इस्लाम शब्द ‘सिल’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ शांति होता है। कुछ विद्वान इसे ‘सलाम’ से जोड़ते हैं, जिसका भी अर्थ शांति है। अतः इस्लाम का मूल अर्थ ही शांति है।

जाकिर नायक जैसे प्रसिद्ध इस्लामी प्रचारक ने इस विचार को लोकप्रिय बनाया कि इस्लाम शांति का धर्म है। उनका टीवी चैनल ‘पीस टीवी’ भी इस विषय का प्रतीक था। उन्होंने जानबूझकर इसे इस्लामिक टीवी न रखकर ‘पीस’ (शांति) रखा, ताकि गैर मुस्लिम भी इसे सहजता से देख सकें और इस्लाम के प्रति उनकी धारणा सकारात्मक बने। दाई का कार्य गैर मुसलमानों को इस्लाम से परिचित कराना और उन्हें आकर्षित करना होता है, जिसे उन्होंने बड़ी दक्षता से किया।

इस प्रकार, सच्चा मुसलमान वह होता है जो शांतिप्रिय होता है, और यही इस्लाम की आत्मा है।

उदाहरण / संदर्भ

गांधी जी के तीन बंदरों की अवधारणा, जो बहरे, गूंगे और अंधों के प्रतीक रूप में है, इस्लाम के दृष्टिकोण से काफिरों की स्थिति का प्रतीकात्मक उदाहरण है। जाकिर नायक के ‘पीस टीवी’ चैनल का नामकरण भी इस्लाम की शांति की संदेशवाहक भूमिका को दर्शाता है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

इस अध्याय में यह निष्कर्ष निकाला गया कि इस्लाम की गहन समझ से ही सामाजिक सद्भावना संभव है। इसके अभाव में गलतफहमियां और तनाव जन्म लेते हैं। साथ ही, आधुनिक काल की शिक्षा प्रणाली और तकनीकी ज्ञान के साथ इस्लामिक शिक्षा का संयोजन आवश्यक है। इस्लाम की मूल प्रकृति शांति है और इसे सही दृष्टि से जानने-समझने का प्रयास हर नागरिक के लिए आवश्यक है।


 

अध्याय 24

इस्लाम की मूल अवधारणा एवं मोहम्मद साहब का संदेश

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में इस्लाम की परिभाषा, सच्चे मुसलमान का अर्थ और पैगंबर मोहम्मद साहब के माध्यम से इस्लाम के प्रारंभिक संदेश की विवेचना की गई है। साथ ही, अल्लाह और मोहम्मद साहब के बीच के सम्बन्ध की समझ प्रस्तुत की गई है, जो इस्लाम की आत्मा को स्पष्ट करता है।

मुख्य व्याख्या

इस्लाम के सच्चे अनुयायी का स्वभाव शांतिप्रिय होता है, क्योंकि ‘इस्लाम’ का अर्थ ही शांति है। अतः, हर सच्चा मुसलमान इस्लाम को हृदय से स्वीकार करता है और इसे प्रिय मानता है। इसके साथ ही, वह जाहिलिया — जो अज्ञानता और कुविचारों का प्रतीक है — से घृणा करता है। इस्लाम में ऐसी धारणा को ‘तोरिया’ कहा जाता है, जो यहाँ आगे किसी अन्य अवसर पर विवेचित की जाएगी।

इस्लाम की परिभाषा ‘ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूलल्लाह’ से होती है। इसका अर्थ है कि अल्लाह के सिवा कोई ईश्वर नहीं और मोहम्मद साहब उसके रसूल (दूत) हैं। यह घोषणा दिन में पाँच बार मस्जिदों से की जाती है। इसमें दो प्रमुख नाम—अल्लाह और मोहम्मद साहब—को सम्मिलित किया गया है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश में ‘आई लव मोहम्मद’ के संदर्भ में हुई घटना से यह स्पष्ट होता है कि मुसलमान इस नाम और उनके प्रति अत्यंत सम्मान और सुरक्षा की भावना रखते हैं। मुसलमानों के बीच यह सवाल आम है, “मेरा और तेरा रिश्ता क्या है?”—इसका उत्तर ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के माध्यम से दिया जाता है, जो इस्लाम का मूल विश्वास है। यह बताता है कि इस्लाम की मान्यता में अल्लाह के आदेश सर्वोपरि होते हैं और मोहम्मद साहब ने अपने जीवन के माध्यम से इन्हीं आदेशों का पालन किया।

मोहम्मद साहब का इतिहास लगभग 1400 वर्ष पूर्व मक्का शहर से जुड़ा है। 610 ईस्वी में जब उनकी आयु 40 वर्ष थी, तब उन्होंने घोषणा की कि उन्हें अल्लाह का संदेश मिला है। इस संदेश को जिब्राइल नामक दूत के माध्यम से प्रेषित किया गया। जिब्राइल अल्लाह के दूत हैं, जो निर्देश देते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

मोहम्मद साहब ने अपने सहाबा (साथियों) को बताया कि जो आदेश उन्हें प्राप्त होते हैं, उनका पालन करना आवश्यक है। यदि कोई आदेश का उल्लंघन करता है, तो उसके विरुद्ध संघर्ष अनिवार्य होगा। इस संघर्ष की वैधता इसी आधार पर स्थापित होती है कि मोहम्मद साहब अल्लाह के रसूल हैं और उनके आदेश अल्लाह के आदेश हैं।

उस समय मक्का में लगभग 360 देवताओं की पूजा होती थी। मोहम्मद साहब ने लोगों से कहा कि वे इन सभी को त्यागकर केवल एक ईश्वर—अल्लाह—की पूजा करें। इस आग्रह को मानने में असफलता की स्थिति में युद्ध की चेतावनी भी दी गई। यह संघर्ष लगभग 23 वर्षों तक चला। इस अवधि में अल्लाह के 6666 आदेश (आयतें) मोहम्मद साहब को जिब्राइल के माध्यम से प्राप्त हुए, जिन्हें एकत्रित कर ‘कुरान’ नामक ग्रंथ का रूप दिया गया।

उदाहरण / संदर्भ

  • ‘ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूलल्लाह’ का जप दिन में पाँच बार मस्जिदों में होता है।

  • उत्तर प्रदेश में ‘आई लव मोहम्मद’ जैसे भावनात्मक घटनाक्रम इस्लामी पहचान की गहनता को दर्शाते हैं।

  • कुरान की संरचना और उसकी स्थापना 23 वर्षों के दैर्ध्य में हुई।

संक्षिप्त निष्कर्ष

इस अध्याय में स्पष्ट हुआ कि इस्लाम की जड़ें अल्लाह की एकेश्वरवाद पर टिकी हैं और मोहम्मद साहब को अल्लाह का रसूल मानना इसका अभिन्न हिस्सा है। मोहम्मद साहब ने 610 ईस्वी में इस संदेश की शुरुआत की, जिसे 23 वर्षों तक जारी रखा गया। कुरान इसी कालखण्ड में संकलित एक दिव्य ग्रंथ है। सच्चा मुसलमान वह है जो इस शांति और एकेश्वरवाद के संदेश को हृदय से स्वीकार करता है।


 

अध्याय 25

इस्लाम की परिभाषा: अल्लाह और मोहम्मद साहब के आदेशों की प्रभुता

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में इस्लाम की व्यापक और सैद्धांतिक परिभाषा का विवेचन किया गया है, जिसमें अल्लाह और उनके दूत मोहम्मद साहब के मध्य संबंध, उनकी आज्ञाओं का महत्त्व, तथा इन आदेशों का पालन ही इस्लाम के होने की मूल शर्त मानी गई है। इसके अतिरिक्त, कुरान एवं हदीस के माध्यम से इस्लाम के सूत्रों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है।

मुख्य व्याख्या

अल्लाह ने मोहम्मद साहब को अपना रसूल चुनकर 23 वर्षों तक अपने आदेश प्रेषित किए। इस प्रकार, अल्लाह और मोहम्मद साहब के बीच का संबंध यह है कि अल्लाह के आदेश इस्लाम के मूल हैं, और मोहम्मद साहब ने जो कहा, किया तथा जो घटनाएं उनके जीवनकाल में हुईं, वे भी इस्लाम का हिस्सा हैं। अतः, इस्लाम की परिभाषा दो महत्वपूर्ण स्रोतों में निहित है—पहला कुरान, जो अल्लाह का वचन है, और दूसरा मोहम्मद साहब की जीवनी, जिसे ‘सिरा’ कहा जाता है, तथा उनके जीवनकाल की कथाएँ, जिन्हें ‘हदीस’ कहा जाता है।

पहली सिरा ‘इब्न शाम’ द्वारा लिखी गई। हदीसों का संकलन इमाम बुखारी ने किया, जिनका संग्रह ‘सहीह बुखारी’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस संग्रह में नौ वॉल्यूम हैं, जिनमें 60% शब्द मोहम्मद साहब के कार्यों और कथनों से संबंधित हैं। इस प्रकार, कुरान में 14%, सिरा में 26% और हदीस में 60% शब्द इस्लाम की अवधारणा का निर्माण करते हैं।

कुरान में कई स्थानों पर अल्लाह स्पष्ट रूप से निर्देश देते हैं कि इंसान को उसकी सेवा (गुलामी) करनी है, केवल उसी के हुक्म का पालन करना है। अध्याय 51 की आयत 56 में कहा गया है कि मनुष्य और जिन को केवल अल्लाह की बंदगी के लिए बनाया गया है। इसके अलावा, कई अन्य आयतों में (जैसे सूरा 3:32, 3:132, 4:13, 4:59, 4:69, 4:80) कहा गया है कि अल्लाह और उनके रसूल के आदेशों का पालन अनिवार्य है।

अगर कोई मनुष्य अल्लाह के आदेशों के विरुद्ध किसी और का पालन करता है, तो वह ‘शर्क’ कहलाता है—जिसे कुरान में सबसे बड़ा अपराध माना गया है। शर्क का अर्थ है अल्लाह के समान या उसके अलावा किसी अन्य की पूजा या आज्ञा मानना। जो लोग अल्लाह और मोहम्मद साहब के आदेशों का पूर्ण पालन करते हैं, उन्हें ‘मुसलमान’ कहा जाता है, और जो ऐसा नहीं करते, वे ‘काफिर’ माने जाते हैं।

अतः इस्लाम का सार ‘अल्लाह और मोहम्मद साहब की पूर्ण गुलामी’ है। यह सरेंडरिंग स्वेच्छा से हो या अनिच्छा से, दोनों में से कोई भी हो सकता है, पर जो आदेश मानता है वही इस्लाम के अधीन है।

अल्लाह ने कुरान में यह भी कहा है कि इस्लाम ‘फितरा’ है—यानि वह मानव की जन्मजात स्वभाविक प्रवृत्ति है। ‘फितरा’ वह स्वाभाविक आंतरिक गुण है, जिसके आधार पर मनुष्य पैदा होता है। अतः इस्लाम मानव के मूल स्वभाव का प्रतिफल है।

उदाहरण / संदर्भ

  • कुरान के अध्याय 51:56 में अल्लाह का स्पष्ट वचन कि मनुष्य को केवल उसकी गुलामी के लिए बनाया गया है।

  • ‘सहीह बुखारी’ के नौ वॉल्यूम, जो इस्लाम की अवधारणा का 60% व्याख्यात्मक आधार हैं।

  • शर्क की अवधारणा, जिसे कुरान ने सबसे बड़ा अपराध माना है।

  • ‘फितरा’ का अर्थ और उससे इस्लाम के स्वाभाविक होने की व्याख्या।

संक्षिप्त निष्कर्ष

इस अध्याय में स्पष्ट हुआ कि इस्लाम की परिभाषा अल्लाह और मोहम्मद साहब के आदेशों का पालन करना है। कुरान और हदीस दोनों इस्लाम की दो स्तंभ हैं, जिनमें अल्लाह के वचन और पैगंबर के जीवन की घटनाएं समाहित हैं। शर्क से बचना तथा पूर्ण समर्पण करना इस्लाम की मूल प्रवृत्ति है, जो कि मनुष्य के जन्मजात स्वभाव ‘फितरा’ से मेल खाती है। इस दृष्टिकोण से, इस्लाम केवल एक धार्मिक आचार नहीं, अपितु जीवन जीने की सम्पूर्ण पद्धति है।


 

अध्याय 26

भारतीय संस्कृति, फितरा और इस्लाम का अंतर्संबंध

पृष्ठभूमि

इस अध्याय में भारतीय संस्कृति के मूल ग्रंथों में वर्णित मनुष्य के स्वाभाविक गुणों और भावों का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, इन भावों की तुलना इस्लाम के ‘फितरा’ सिद्धांत से की गई है। यह चर्चा हमें समझाती है कि मनुष्य के जन्मजात स्वभाव और इस्लाम की अवधारणा में गहरा मेल है, जो मानव व्यवहार और जीवन के संघर्षों को समझने में सहायक है।

मुख्य तर्क/व्याख्या

भारतीय सांस्कृतिक ग्रंथों के अनुसार, मनुष्य जन्म के समय एक विशेष स्वाभाव या गुणों के साथ आता है, जिसे ‘अहं’ का भाव कहा गया है। यह अहं भाव प्रारंभ में स्थूल होता है और धीरे-धीरे अहंकार का रूप ले लेता है। अहंकार के कारण मनुष्य के अंदर भय उत्पन्न होता है। भय से उत्पन्न भाव ‘काम’ के रूप में प्रकट होता है, जो अपने आप में संसार के भोग की लालसा है।

काम के परिणामस्वरूप संघर्ष उत्पन्न होता है, और संघर्ष से संगठन का जन्म होता है। संगठन की इच्छा मनुष्य में शक्ति की चाह उत्पन्न करती है, ताकि वह संघर्ष में विजय प्राप्त कर सके। संगठन में शामिल होने या उसे बनाने की प्रवृत्ति व्यक्ति के अंदर इनबर्न (जन्मजात) है। संगठन के कारण बंधन उत्पन्न होते हैं, जो अंततः गुलामी का रूप लेते हैं।

इन सभी भावों — अहं, अहंकार, भय, काम, संघर्ष, संगठन, बंधन और दुख — को मनुष्य अपने जन्म के समय साथ लेकर आता है। इन्हें संस्कृत में ‘मूल भाव’ कहा गया है। ये भाव किसी बाहरी शिक्षा या संस्थान के द्वारा सिखाए नहीं जाते, क्योंकि ये जन्मजात हैं। इसी मूल स्वभाव को ‘फितरा’ कहा जाता है।

इस प्रकार फितरा का अर्थ है वह प्राकृतिक स्वभाव, जो व्यक्ति जन्म के समय ग्रहण करता है। इस्लाम इसी फितरा के अनुसार जीवन का मार्ग दर्शाता है। इसलिए कहा जाता है कि इस्लाम ‘फितरा’ है, अर्थात मनुष्य का जन्मजात स्वभाव।

उदाहरण/संदर्भ

  • भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित अहं, अहंकार, भय, काम, संघर्ष, संगठन और बंधन के भाव।

  • इन भावों का जन्मजात होना और किसी संस्थान द्वारा न सिखाया जाना।

  • कुरान की आयतें जो इस्लाम को फितरा घोषित करती हैं, अर्थात जन्मजात स्वभाव के समान।

संक्षिप्त निष्कर्ष

इस अध्याय में यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय संस्कृति के अनुसार मनुष्य अपने जन्म के समय अनेक जटिल भाव लेकर आता है, जो उसके जीवन की अनेक जटिलताओं की उत्पत्ति करते हैं। इस स्वाभाव को ‘फितरा’ कहा गया है। इस्लाम भी इसी फितरा के अनुरूप है, क्योंकि यह मानव के जन्मजात स्वभाव को स्वीकार कर उसके अनुरूप जीवन व्यतीत करने का मार्ग प्रस्तुत करता है। इस प्रकार, भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान और इस्लाम के मूल सिद्धांतों में एक गहरा सांदर्भिक और वैचारिक मेल देखा जा सकता है।

अतः यह स्पष्ट होता है कि इस्लाम केवल बाहरी धार्मिक विधि नहीं, बल्कि जन्मजात मानवीय स्वभाव की पहचान और उसके अनुरूप जीवन के नियमों का समूह है।


 

धन्यवाद।

भारत तेरे टुकड़े होंगे': एक नारे की सच्चाई से राजनीतिक हथियार बनने तक की कहानी

 अध्याय 1: 🕋 कुरान, कयामत और सच्चे मुस्लिम का परिचय 📜 1. विषय की पृष्ठभूमि 🌙 कुरान में लोहे की अज्‍ल (अजल) पर लिखा वादा, कयामत के दिन से ...